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भारतीय सड़कों का कड़वा सच और ज़िंदगी की कीमत

​कुछ दिन पहले मैंने एक वीडियो क्लिप देखी, जिसने मुझे अंदर तक हिला दिया. इसमें एक भारतीय ट्रक ड्राइवर की लापरवाही की वजह से अमेरिका जैसे देश में अप्रवासी ड्राइवरों पर ट्रक चलाने से प्रतिबंध लगा दिया गया. यह खबर सुनने में भले ही दूर की लगे, लेकिन इसने मुझे हमारे देश की सड़कों का एक कड़वा सच दिखाया. ​जिस तरह की गलती उस ड्राइवर ने की, वैसी गलतियां हम भारत में रोज़ देखते हैं. गलत दिशा में गाड़ी चलाना , बिना इंडिकेटर दिए मुड़ना, और ओवरटेक करना — ये सब हमारे लिए आम बात हो गई है. हम अक्सर अपने आसपास के हाईवे पर देखते हैं कि लोग बस कुछ मिनट बचाने के लिए अपनी और दूसरों की जान को खतरे में डाल देते हैं. मुझे तो अब डर लगता है, जब मैं किसी ट्रक को तेज रफ्तार से गलत दिशा में आते देखता हूँ. ​सबसे ज्यादा दुख इस बात का है कि हमारे देश में जिंदगी की कीमत मानो कुछ है ही नहीं. अमेरिका जैसे देश में एक ड्राइवर की गलती से इतना बड़ा कदम उठाया गया, लेकिन हमारे यहाँ आए दिन लोग सड़क दुर्घटनाओं में मरते हैं और दोषियों को शायद ही कभी कड़ी सजा मिलती है. ​हम अपनी गाड़ी से किसी कुत्ते को छू लेने पर भी ग्लानि महसूस...

माँ: राखी एक विरह

फिर आई राखी, फिर वही साँझ आई है, कभी उदास होता था जिसका चेहरा त्यौहार की आहट से, आज उन्हीं यादों में मेरी आँख भर आई है। वो चार भाई, जो एक-एक कर छूटे, वो सबसे छोटा जो आँखों के सामने ही टूटते गए। माँ हर राखी पर सुनाती थी किस्सा उस गुणी का, जो दो रुपये की अनमोल भेंट लेकर चला आया करता था। उसकी आवाज़ में एक दर्द होता था जो आँखों से बह निकलता था। खेतों की सूखी ज़मीन से, वह सब्ज़ियाँ उगाया करता था, हर साल उन चंद रुपयों से माँ के लिए राखी का तोहफ़ा लाता था। आज तिजोरियों में पैसे बहुत हैं, पर उस दो रुपये की क़ीमत कहाँ, जो सुकून मिलता था, वो बेपनाह मोहब्बत कहाँ। लोग कहते थे, "दीदी, मैं तो हूँ," पर माँ को कोई मंज़ूर नहीं, वह किनारे बैठ बस रोती रही, अपने भाई के विरह से दूर नहीं। यह एक साल की बात नहीं, वो बूढ़ी हुईं, पर दर्द जवाँ था। आज माँ भी नहीं हैं इस ज़मीं पर, पर उनका वो विरह, वो दर्द बाकी है। आज मुझे भी वही उदासी सताती है, जब भी सामने आती है ये राखी है।

स्कूल के किस्से: एक अनसुनी कहानी

सबसे शरारती क्लास और एक अनकही होड़ यह किस्सा तब का है जब स्कूल का हर दिन एक नई शरारत के साथ शुरू होता था। हमारी क्लास की पहचान उसकी बातों और शोर से थी, और हमारी गिनती स्कूल की सबसे बातूनी क्लासेज में होती थी। हमारी क्लास को देखकर ऐसा लगता था मानो एक सर्कस चल रहा हो, जहाँ हर कोई अपनी धुन में मगन था और हर तरफ एक अजीब सी, खुशनुमा अव्यवस्था थी। कोई भी टीचर हमारे क्लास में आती, तो अक्सर कुछ बच्चों को बिना कुछ बोले ही क्लास से बाहर निकाल देती या सबसे पीछे खड़ा कर देती थीं, लेकिन इन सबके बावजूद, हमारी क्लास का शोर पूरे स्कूल के शोर पर हमेशा हावी रहता था। जब कभी भी टीचर के क्लास में आने में थोड़ी सी देरी हो जाती थी, तो क्लास की मॉनिटर चॉक से ब्लैकबोर्ड पर उनके नाम लिख देती थी। अक्सर टीचर के आने से पहले ही ब्लैकबोर्ड साफ़ कर दिया जाता था, पर कभी-कभी शोर हद से ज़्यादा गुज़र जाता, तो उन शरारती बच्चों का नाम कॉपी पर लिख लिया जाता था और वो नाम टीचर तक पहुँच जरूर जाते थे। फिर क्या होता था, यह अंदाज़ा लगाना मुश्किल नहीं था। डंडे बरसते थे, तशरीफ़ पर, पर गिने नहीं जाते थे। इस शोर के बीच, हमारी क्लास के टॉपर ...

जब दोस्ती सपनों के बोझ तले दब गई...

  जब दोस्ती सपनों के बोझ तले दब गई... कभी-कभी ज़िंदगी हमें ऐसे मोड़ पर लाकर खड़ा कर देती है, जहाँ रिश्ते और सपने — दोनों में से किसी एक को चुनना पड़ता है। यह कहानी सिर्फ एक व्यापार की नहीं है, यह उस दौर की है जहाँ दोस्ती, उम्मीद, और व्यवहारिकता एक-दूसरे से टकरा गए। चमक की शुरुआत एक ऐसे इंसान की बात है जिसने बचपन में तवज्जो नहीं पाई। न दोस्त थे, न पहचान। लेकिन मेहनत से एक मुकाम हासिल किया — एक अच्छा करियर, और फिर एक महंगी कार — Fortuner। वो सिर्फ कार नहीं थी, बल्कि एक प्रतीक बन चुकी थी — उसकी पहचान का, उसकी सफलता का। हर बातचीत, हर सफर, हर मुलाकात — सब कुछ उसी के इर्द-गिर्द घूमता। लोगों ने उसे देखना शुरू किया, जानना चाहा, और शायद पहली बार उसे वो "value" मिली जिसकी उसे बरसों से तलाश थी। एक सपना – Naimish Natural एक दिन एक विचार आया — शुद्ध तेल का व्यापार, cold press से। नाम रखा गया — Naimish Natural । सोच थी अच्छी, पर रास्ते अलग-अलग थे। किसी का मानना था — "ऑनलाइन से शुरू करो, प्रीमियम रेट रखो, ब्रांड बनो।" किसी और का सुझाव था — "छोटे स्तर से शुरू करो, ret...

दो दोस्त और मैं

थे दो मेरे प्यारे दोस्त, अलग थे दोनों, अलग सी बात, एक दिन यूँ ही संयोग हुआ, दोनों मिले, खिल उठी बात। तीनों साथ थे कुछ पल को, हँसी, ठिठोली, मीठी बात, फिर ऐसा कुछ हुआ जनाब, बढ़ने लगी उनकी मुलाक़ात। मेरे दोस्त को मेरे दोस्त की दोस्ती लगने लगी खास, मैं वही था, पर जैसे अब मैं बन गया बस इक एहसास। दोनों में गहराई आई, हर बात में वो शामिल थे, मैं धीरे-धीरे पीछे छूटा, जैसे कहानी के आख़िरी पन्ने पे बस नाम मेरा बाकी रह गया। न कोई शिकवा, न कोई ग़िला, पर दिल में उठी एक टीस सी, जो कभी तीन थे साथ चलते, अब मैं बस एक रेखा सी।

कौन सही कौन गलत- सबके जूते अलग अलग

अगर हम अपने पांव किसी और के जूते में डालकर चलने की कोशिश करें, तो शायद हमें समझ में आए कि इस दुनिया में कोई भी वास्तव में 'गलत' नहीं है। हर किसी की परिस्थितियाँ अलग होती हैं, संघर्ष अलग होते हैं, और फैसले उन्हीं के आधार पर लिए जाते हैं। शायद जो हमें गलत लगता है, वह उनके लिए उस पल में एकमात्र रास्ता होता है। हाँ, कुछ ऐसे भी लोग होते हैं, जिनकी परिस्थिति जानने के बाद भी हमें लगता है कि वो कुछ और बेहतर कर सकते थे — लेकिन ऐसे लोग बहुत कम होते हैं। अधिकतर लोग वही करते हैं, जो उनके हिसाब से उस समय ठीक होता है।

स्वाति — जो मेरी सीप में मोती होती है"(राहुल की कविता, सिर्फ़ स्वाति के लिए)

स्वाति... तुम कोई नाम नहीं हो, तुम तो मेरी धड़कनों की लय हो। जब पहली बार स्वाति मुस्कराई, राहुल की दुनिया थम गई थी। स्वाति की वो मुस्कान किसी पूजा की आखिरी घंटी जैसी थी — पवित्र… और हमेशा के लिए। स्वाति, तुम वो बूँद हो जो जब गिरती हो सीप में, तो मोती होती हो। और राहुल… वो सीप है, जो बस तुम्हारे लिए खुला है। स्वाति के बिना राहुल अधूरा, स्वाति के साथ — हर पल मुकम्मल, हर सांस रंगीन। जब भी स्वाति की आँखें कुछ कहती हैं, राहुल कुछ नहीं कहता, बस सुनता है… क्योंकि स्वाति की ख़ामोशी भी प्यार में भीगी होती है। अब हर सुबह राहुल की चाय में भी स्वाति का स्वाद होता है, हर शाम की थकान में स्वाति की हथेली की गर्माहट। स्वाति के साथ राहुल ने जीना सीखा, और अब हर दिन बस यही दुआ करता है — कि अगली ज़िन्दगियाँ भी स्वाति के नाम लिखी जाएं। स्वाति... तुम जब साथ हो, तो वक़्त रुक सा जाता है। और जब दूर हो, तो भी हर चीज़ में बस स्वाति ही स्वाति नजर आती हो।

सुनैना के नैना

सुनैना के नैना जब कमल के नैना से टकराए, तो सुनैना के नैना सिर्फ सुनैना के नहीं रहे। अब कमल के नैना हर बार सुनैना के नैना ढूँढते हैं, और सुनैना के नैना हर बार कमल के नैना चुराते हैं। सुनैना ने कहा — "ये नैना मेरे हैं", पर कमल ने मुस्कुरा कर कहा — "अब ये नैना भी सुनैना हैं।" नैना, सुनैना के थे, फिर कमल के हो गए, अब दोनों के नैना बस सुनैना ही सुनैना हो गए। इतने नैना, फिर भी एक सुनैना। और उस एक सुनैना में — छुपे हैं कमल के भी दो नैना। अब नैना, सुनैना के हैं, पर हर पल कमल को देखना चाहते हैं। और कमल के नैना — अब सुनैना से अलग कहाँ रह पाएंगे?

कल्पना की कल्पना

जब मधुमय ने कल्पना की कल्पना की, तब वह कल्पना, केवल एक कल्पना थी — अकल्पनीय कल्पना। अब जब कल्पना, कल्पना से निकलकर मधु के साथ है — तो यह कल्पना की जा सकती है, कि वह कल्पना, अब कल्पना नहीं रही। अब कल्पना, मधु की कल्पना में नहीं — मधुमय की कल्पना में भी नहीं — बल्कि एक जीती-जागती कल्पना बन गई है, जो कल्पना से अधिक हक़ीक़त है, और हक़ीक़त से भी अधिक कल्पना। क्योंकि... सोचना भी तो एक कल्पना है। और कल्पना — कभी भी केवल कल्पना नहीं होती।