स्वाति — जो मेरी सीप में मोती होती है"(राहुल की कविता, सिर्फ़ स्वाति के लिए)
स्वाति...
तुम कोई नाम नहीं हो,
तुम तो मेरी धड़कनों की लय हो।
जब पहली बार स्वाति मुस्कराई,
राहुल की दुनिया थम गई थी।
स्वाति की वो मुस्कान
किसी पूजा की आखिरी घंटी जैसी थी —
पवित्र… और हमेशा के लिए।
स्वाति, तुम वो बूँद हो
जो जब गिरती हो सीप में,
तो मोती होती हो।
और राहुल…
वो सीप है,
जो बस तुम्हारे लिए खुला है।
स्वाति के बिना राहुल अधूरा,
स्वाति के साथ —
हर पल मुकम्मल,
हर सांस रंगीन।
जब भी स्वाति की आँखें कुछ कहती हैं,
राहुल कुछ नहीं कहता,
बस सुनता है…
क्योंकि स्वाति की ख़ामोशी भी
प्यार में भीगी होती है।
अब हर सुबह
राहुल की चाय में भी
स्वाति का स्वाद होता है,
हर शाम की थकान में
स्वाति की हथेली की गर्माहट।
स्वाति के साथ
राहुल ने जीना सीखा,
और अब
हर दिन बस यही दुआ करता है —
कि अगली ज़िन्दगियाँ भी
स्वाति के नाम लिखी जाएं।
स्वाति...
तुम जब साथ हो,
तो वक़्त रुक सा जाता है।
और जब दूर हो,
तो भी हर चीज़ में बस स्वाति ही स्वाति नजर आती हो।
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