दो दोस्त और मैं
थे दो मेरे प्यारे दोस्त,
अलग थे दोनों, अलग सी बात,
एक दिन यूँ ही संयोग हुआ,
दोनों मिले, खिल उठी बात।
तीनों साथ थे कुछ पल को,
हँसी, ठिठोली, मीठी बात,
फिर ऐसा कुछ हुआ जनाब,
बढ़ने लगी उनकी मुलाक़ात।
मेरे दोस्त को मेरे दोस्त की
दोस्ती लगने लगी खास,
मैं वही था, पर जैसे अब
मैं बन गया बस इक एहसास।
दोनों में गहराई आई,
हर बात में वो शामिल थे,
मैं धीरे-धीरे पीछे छूटा,
जैसे कहानी के आख़िरी पन्ने पे बस नाम मेरा बाकी रह गया।
न कोई शिकवा, न कोई ग़िला,
पर दिल में उठी एक टीस सी,
जो कभी तीन थे साथ चलते,
अब मैं बस एक रेखा सी।
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