संदेश

जून, 2025 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

पापा का जन्मदिन – एक स्मृति का उत्सव

आपका जन्मदिन – एक स्मृति का उत्सव” आज वो दिन है पापा, जब हर साल घर में रौनक होती थी, आपके चेहरे की मुस्कान सबको एक साथ लाती थी। पर आज… आप नहीं हो — और सब कुछ है, फिर भी सब कुछ अधूरा सा है। आज के दिन समझ नहीं आता — आपकी याद में आँसू बहाऊँ, या आपकी हँसी को जी लूँ? आपका जाना दुख देता है, पर आपकी याद — एक ताक़त भी है। मैं नहीं चाहता कि यह दिन कभी भी किसी आम तारीख़ की तरह खो जाए, क्योंकि जब तक यह तारीख़ ज़िंदा है — आप भी ज़िंदा हैं। मैं अपने बेटे को बताऊँगा आपके बारे में — कि उसके बाबा कैसे थे, कैसे उन्होंने संघर्ष किया, कैसे उन्होंने बिना कहे सब कुछ दे दिया। आपकी विरासत मैं आगे बढ़ाऊँगा, आपके उस प्रेम को जीऊँगा जो आपने हर बार चुपचाप बाँटा। आप जहाँ भी हों — निश्चिंत रहिए, आपका बेटा आज भी हर जन्मदिन पर आपको प्रेम से याद करता है… और करता रहेगा।

जब सरलता को ढोंग कहा गया

  जब सरलता को ढोंग कहा गया एक समय था जब मेरी सादगी, किसी के लिए अपनापन थी, मेरी ईमानदारी — मित्रता की मिसाल। फिर अचानक… एक व्हाट्सएप स्टेटस ने मुझे ठहरा दिया। "रिश्तों में टिकट क्यों नहीं होते?" और उसके बाद – "ढोंग..." वो शब्द मेरे अंदर किसी कील की तरह धँस गया। थोड़ी-सी नाराज़गी थी, थोड़ी दूरी थी, पर इतनी नहीं कि मेरी पहचान बदल दी जाए। क्या मैं सच में बदल गया था? या अब मैं वैसा दिखने लगा जैसा लोग मुझे देखना नहीं चाहते थे? अब सोचता हूँ — शायद मैंने प्रेम और मित्रता का घोल कुछ ज़्यादा ही शुद्ध परोसा था। और जब कोई चीज़ बहुत सच्ची होती है, तो अक्सर… वो पचती नहीं। मैंने तय कर लिया है — अब मैं किसी के लिए इतना सुलभ नहीं रहूंगा। ना इतना स्पष्ट, ना इतना सरल। अब थोड़ा रहूँगा खुद में, थोड़ा उलझा हुआ, थोड़ा अनजान-सा। क्योंकि जब सरलता को ढोंग कहा जाए, तो खुद को बचा लेना ज़रूरी हो जाता है।

दो पंछी और एक घोंसला

  "दो पंछी और एक घोंसला" थे दो पंछी, एक डाल पर, चुन-चुन कर तिनका लाए थे, सपनों से बुना एक घर — घोंसला कहा जिसे उन्होंने। हर सुबह सूरज संग जागते, हर शाम एक-दूजे में सिमटते, फिर आया जीवन का सबसे सुंदर गीत — नन्हे पंखों की चहचहाहट। वो घोंसला भर गया था बच्चों से, हँसी, मासूमियत और चहक से। माँ ने पंखों की छाँव दी, पिता ने हर आंधी से बचा लिया। सालों बीते… पंख अब मजबूत हो चले थे, नज़रें आसमान नापने लगी थीं। और फिर एक दिन, नन्हे पंछी उड़ गए — नई डालें, नए साथी, नए घोंसले खोजने। डाल वही रही, घोंसला भी वहीं, पर अब उसमें सन्नाटा था… बस दो पंछी, और ढेरों यादें थीं। वो मुस्कराए — क्योंकि यही प्रकृति का विधान है। वे जानते थे, अब कोई और तिनका जोड़ रहा होगा… कहीं किसी और डाल पर, एक नई शुरुआत के लिए।

पंछी और डाल की दोस्ती

  "पंछी और डाल की दोस्ती" थी एक हरी-भरी सी डाल, चुपचाप खड़ी थी बरसों से, ना कोई शिकायत, ना कोई सवाल, बस इंतज़ार था किसी अपने से। एक दिन उड़ता आया एक पंछी, आसमान से थका-मांदा सा, बैठा उस डाल पर धीरे से, जैसे पहचान हो पुरानी सी। डाल मुस्काई, कुछ न बोली, पंछी ने पंख समेट लिए। धूप, छाँव, बारिशें आईं, और दोनों एक-दूजे के संग जी लिए। पंछी गाता, डाल झूमती, पवन भी रुककर सुनती थी। साथ बिताए लम्हे वो प्यारे, जैसे बचपन के दोस्त हमारे। डाल ने कभी पंछी को रोका नहीं, जब वो उड़ना चाहे आसमान में। पंछी ने भी हर बार लौट वहीं विश्राम लिया, उसी स्थान में। दोस्ती थी न शब्दों की मोहताज, न वादों की ज़रूरत थी, एक विश्वास था, एक अपनापन, जो हर मौन में भी ज़िंदा थी। कभी-कभी पंछी दिन-दिन भर नहीं आता, डाल इंतज़ार में झुक सी जाती है। फिर जब पंखों की फड़फड़ाहट सुनती, फिर से मुस्कुराकर लहराती है। पंछी जानता है — हर उड़ान के बाद एक ठिकाना है, और डाल को यकीन है — हर आकाश में उसका पंछी ही राजा है।