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धरती: हमारा घर, हमारी जिम्मेदारी!

  धरती: हमारा घर, हमारी जिम्मेदारी! नमस्ते दोस्तों! आज एक ऐसे विचार पर बात करनी है जो मेरे मन में अक्सर आता है। हम इंसान कितनी बड़ी-बड़ी बातें करते हैं – मंगल पर बस्ती बसाने की, चाँद पर जाने की, और दूसरे ग्रहों पर पानी और जीवन खोजने की। ये सपने वाकई बहुत बड़े और रोमांचक हैं! कैसा विरोधाभास है ये! एक तरफ हम मंगल पर पानी की एक-एक बूंद खोज रहे हैं, ताकि भविष्य में कभी वहाँ बस सकें। वहीं दूसरी तरफ, अपनी ही धरती पर जहाँ पानी की नदियाँ बहती हैं, झरने गिरते हैं और मीठे पानी का विशाल भंडार है, उसे हम बर्बाद कर रहे हैं । हम नदियों को प्रदूषित कर रहे हैं, भूजल का स्तर गिरा रहे हैं, और पानी को बेवजह बहा रहे हैं। हम दूसरे ग्रहों पर ऐसे संकेत तलाशते हैं जहाँ पेड़-पौधे पनप सकें और हमें ऑक्सीजन मिल सके। लेकिन अपनी इसी धरती पर, जहाँ सदियों पुराने जंगल हैं, घनी हरियाली है, जो हमें जीवनदायिनी हवा देती है – उन्हीं पेड़ों को हम बेदर्दी से काट रहे हैं । जंगलों का सफाया हो रहा है और हम पर्यावरण को लगातार नुकसान पहुँचा रहे हैं। हम चाँद और मंगल पर खनिजों और संसाधनों के खनन की बात कर रहे हैं। पर अपनी धरत...

उपन्यास: नानी का आँगन

अध्याय 1: नई दुनिया शहर की सुबहें गाँव जैसी नहीं होतीं। वहाँ सूरज उगता है तो लगता है जैसे मोबाइल की स्क्रीन जल उठी हो। कोई मुर्गा नहीं बांग देता, अलार्म बजता है। रवि शहर की एक कंपनी में नौकरी करता है, जहाँ ज़्यादातर काम कंप्यूटर पर होता है। साल का आख़िरी महीना था। ऑफिस में मीटिंग चल रही थी—"नए साल के लक्ष्य और AI का उपयोग" विषय पर चर्चा हो रही थी। सभी बोल रहे थे—ChatGPT से रिपोर्ट, Bard से मेल ड्राफ्ट, ऑटोमेशन, भविष्य का बदलाव... रवि चुपचाप बैठा था। अचानक पापा का फ़ोन आया। मीटिंग में था, उसने उठाया नहीं। कुछ देर बाद कॉल किया। "बेटा," उधर से आवाज़ आई, "नाना-नानी के घर पर कब्ज़ा हो गया है। मिस्त्री ईंट और सरिया लेकर छत डालने की तैयारी कर रहे हैं।" रवि के चेहरे से रंग उड़ गया। उसी घर की बात हो रही थी जहाँ उसकी माँ बचपन में खेलती थी। अब वह घर पराया हो गया था। "कब निकलना है?" उसने पूछा। "कल तड़के।" शहर की मशीनों के बीच रवि को पहली बार अतीत की मिट्टी खींचती हुई लगी। अध्याय 2: फ़ोन की घंटी रात भर नींद नहीं आई। माँ की स्मृतियाँ मन में कौंधती रह...

हक से तो आ

तू जा, रूठ जा, मैं मनाने वाला नहीं, तू चाहे जितना सितम कर, मैं झुकने वाला नहीं। तेरे नखरों की आदत अब दिल पे भारी है, मेरे सब्र की चादर अब भीगती सारी है। मैं चुप हूँ, मगर टूटा नहीं हूँ कहीं, तेरी बेरुख़ी से मिटा नहीं हूँ वहीं। प्यार से बोल, तो आसमान झुक दूंगा, समंदर को मुठ्ठी में बंद कर दूंगा। पर एक बार, बस एक बार — हक से तो आ, बेझिझक, बेतकल्लुफ़, जैसे हम पहले मिला करते थे, तेरे मेरे बीच कोई फ़ासला न रहा करता था।

लघु कथा: "वह रात"

अस्पताल की चौथी मंज़िल पर एक कमरा था। अंदर एक महिला लेटी थी – ऑपरेशन सुबह होना था। शरीर बीमार था, पर मन… वो कहीं और उलझा हुआ था। शाम होते-होते रिश्तेदार, परिचित, सभी मिलने आए थे। सबने ढाढ़स बंधाया – "डरने की कोई बात नहीं… तुम तो बहुत मज़बूत हो।" थोड़ी देर बाद सब एक-एक कर वापस चले गए – घर पर बच्चे थे, थकान थी, नींद ज़रूरी थी। कहकर निकल गए, जैसे इंसान की ज़रूरत सिर्फ दवाओं तक सीमित हो। कमरे में अब सिर्फ वह महिला और कमरे की दीवारें थीं। और एक व्यक्ति। जो न डॉक्टर था, न रिश्तेदार खास, न कोई ज़िम्मेदार सदस्य। बस… एक ऐसा इंसान, जिसके अंदर कुछ अधूरा, कुछ अनकहा, कुछ अंदर से जुड़ा हुआ था। वह थोड़ी देर चुपचाप खड़ा रहा। फिर जाकर रिसेप्शन से एक स्टूल लाया, और उस पलंग के पास बैठ गया। धीरे से उसने महिला की हथेली थामी। महिला ने आँखें खोलीं, थक कर मुस्कुराई। "तुम रुके हो?" उसने बस इतना कहा: "नींद नहीं आ रही थी… सोचा यहीं बैठ जाऊँ।" उसकी बात में कोई दावा नहीं था, कोई प्रदर्शन नहीं। बस एक मौन उपस्थिति थी – जो दर्द का इलाज नहीं थी, पर अकेलेपन की दवा ज़रूर थी। सुबह सूरज निकला...

मेरा ऐतबार तो कर

मैं तुमसे मिलने आऊंगा, मेरा ऐतबार तो कर। तेरे मांग में भरूं सिन्दूर, मेरा ऐतबार तो कर। अभी राहें रुकी हैं शायद, वक्त थोड़ा बेवफा है, पर मेरी वफ़ा पे संदेह न हो, तू इंतज़ार तो कर। मैं अभी न मिल सकूं तो तू बेवफ़ा ना समझना, धड़कनों में बसा हूँ तेरे, मेरा ऐतबार तो कर। चाँदनी भी पूछती है मुझसे तेरा हाल हर रात, मैं तेरे ख्वाबों में हूँ हर पल, तू एतबार तो कर।

एक किस्सा श्रीमती जी की ज़ुबानी 🎵(लाइट म्यूजिक, मेलोडी और चुटीली बीट्स के साथ)

🎵 एक किस्सा श्रीमती जी की ज़ुबानी 🎵 (लाइट म्यूजिक, मेलोडी और चुटीली बीट्स के साथ) [अंतरा – 1] एक शाम थी प्यारी, हवा में थी मिठास, स्वाति-आदि खा रहे थे बताशे पास। तभी दुकान में आया एक ज्ञानी, पनीर की बोली से शुरू हुई कहानी। [कोरस] हिसाब लगाओ भाई, दाम बताओ सही, न कम चलें हम, न ज़्यादा लूट सही। दुकानदार बोले – “हमरे रेट फिक्स हैं भाई, प्याले में मटर लो, पर तौल में होई सफाई।” [अंतरा – 2] ग्राहक बोला – "100 ग्राम ही लूंगा बस, क्यों दे रहे 35, ये तो हद है कुछ खास!" दुकानदार बोला – "छोटा पैक है भैया, 350 का नहीं, यही सिस्टम है भइया!" [कोरस] अरे भाई सुनो ज़रा, न करो तुम बहस भारी, हम ना बेचें चवन्नी-छप्पन, यही है हमारी बारी। मटर भी चाहिए थोड़ी, सिर्फ 5 की मांग, दुकानदार बोले – “भैया, नियम हैं हमारे संग!” [अंतरा – 3] “50 ग्राम मटर 8 की, 2 ज़्यादा लग गए, अब हुए 10, ग्राहक जी चौंक गए।” बोले – "160 किलो बोल कर, 200 तक ले आए, इतनी मटर से तो सब्जी में पनीर कहीं न पाए!" [कॉमिक ब्रिज] बीच में आई दुकानदार की श्रीमती जी, हँसते हुए बोली – “हम...

🎭 "किरदार अपने-अपने थे..."

जो रूठे हैं उन्हें मनाना ही क्यों... दामन तुमने छोड़े हैं, तो दोबारा पकड़ना क्यों... तुम रहो अपनी दुनिया में खुश, तुम्हें अपनी दुनिया में लाना क्यों... एक बार हमने जो ‘ना’ कही, उसके पीछे कुछ मजबूरियाँ थीं। पर तुम यूँ रूठे, जैसे हमने कोई गुनाह किया हो, जैसे मोहब्बत को अपमान कर दिया हो। अब तुम दोनों ही गुल खिलाओ, हम न सही तेरे गुलशन में तो क्या... हम अपनी वीरानियों में फिर से हरियाली उगाना सीख लेंगे। और हाँ... किसी किरदार ने ठीक ही कहा था — ज़िंदगी एक रंगमंच है। हर किसी का किरदार तय है — कब कौन आएगा, कितना ठहरेगा, और कब पर्दे के पीछे चला जाएगा। तुम्हारा किरदार भी बस इतना ही था — मेरी ज़िंदगी के नाटक में। नायक बनकर नहीं सही, पर एक अनुभव बनकर रहोगे। क्योंकि इस रंगमंच में कुछ भी व्यर्थ नहीं जाता, हर रिश्ता — कुछ न कुछ सिखा ही जाता है।