धरती: हमारा घर, हमारी जिम्मेदारी!
धरती: हमारा घर, हमारी जिम्मेदारी! नमस्ते दोस्तों! आज एक ऐसे विचार पर बात करनी है जो मेरे मन में अक्सर आता है। हम इंसान कितनी बड़ी-बड़ी बातें करते हैं – मंगल पर बस्ती बसाने की, चाँद पर जाने की, और दूसरे ग्रहों पर पानी और जीवन खोजने की। ये सपने वाकई बहुत बड़े और रोमांचक हैं! कैसा विरोधाभास है ये! एक तरफ हम मंगल पर पानी की एक-एक बूंद खोज रहे हैं, ताकि भविष्य में कभी वहाँ बस सकें। वहीं दूसरी तरफ, अपनी ही धरती पर जहाँ पानी की नदियाँ बहती हैं, झरने गिरते हैं और मीठे पानी का विशाल भंडार है, उसे हम बर्बाद कर रहे हैं । हम नदियों को प्रदूषित कर रहे हैं, भूजल का स्तर गिरा रहे हैं, और पानी को बेवजह बहा रहे हैं। हम दूसरे ग्रहों पर ऐसे संकेत तलाशते हैं जहाँ पेड़-पौधे पनप सकें और हमें ऑक्सीजन मिल सके। लेकिन अपनी इसी धरती पर, जहाँ सदियों पुराने जंगल हैं, घनी हरियाली है, जो हमें जीवनदायिनी हवा देती है – उन्हीं पेड़ों को हम बेदर्दी से काट रहे हैं । जंगलों का सफाया हो रहा है और हम पर्यावरण को लगातार नुकसान पहुँचा रहे हैं। हम चाँद और मंगल पर खनिजों और संसाधनों के खनन की बात कर रहे हैं। पर अपनी धरत...