कल्पना की कल्पना
जब मधुमय ने कल्पना की कल्पना की,
तब वह कल्पना, केवल एक कल्पना थी —
अकल्पनीय कल्पना।
अब जब कल्पना, कल्पना से निकलकर
मधु के साथ है —
तो यह कल्पना की जा सकती है,
कि वह कल्पना, अब कल्पना नहीं रही।
अब कल्पना,
मधु की कल्पना में नहीं —
मधुमय की कल्पना में भी नहीं —
बल्कि एक जीती-जागती कल्पना बन गई है,
जो कल्पना से अधिक हक़ीक़त है,
और हक़ीक़त से भी अधिक कल्पना।
क्योंकि...
सोचना भी तो एक कल्पना है।
और कल्पना —
कभी भी केवल कल्पना नहीं होती।
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