माँ: राखी एक विरह
फिर आई राखी, फिर वही साँझ आई है,
कभी उदास होता था जिसका चेहरा त्यौहार की आहट से,
आज उन्हीं यादों में मेरी आँख भर आई है।
वो चार भाई, जो एक-एक कर छूटे,
वो सबसे छोटा जो आँखों के सामने ही टूटते गए।
माँ हर राखी पर सुनाती थी किस्सा उस गुणी का,
जो दो रुपये की अनमोल भेंट लेकर चला आया करता था।
उसकी आवाज़ में एक दर्द होता था जो आँखों से बह निकलता था।
खेतों की सूखी ज़मीन से,
वह सब्ज़ियाँ उगाया करता था,
हर साल उन चंद रुपयों से माँ के लिए राखी का तोहफ़ा लाता था।
आज तिजोरियों में पैसे बहुत हैं, पर उस दो रुपये की क़ीमत कहाँ,
जो सुकून मिलता था, वो बेपनाह मोहब्बत कहाँ।
लोग कहते थे, "दीदी, मैं तो हूँ," पर माँ को कोई मंज़ूर नहीं,
वह किनारे बैठ बस रोती रही, अपने भाई के विरह से दूर नहीं।
यह एक साल की बात नहीं, वो बूढ़ी हुईं, पर दर्द जवाँ था।
आज माँ भी नहीं हैं इस ज़मीं पर, पर उनका वो विरह, वो दर्द बाकी है।
आज मुझे भी वही उदासी सताती है, जब भी सामने आती है ये राखी है।
कभी उदास होता था जिसका चेहरा त्यौहार की आहट से,
आज उन्हीं यादों में मेरी आँख भर आई है।
वो चार भाई, जो एक-एक कर छूटे,
वो सबसे छोटा जो आँखों के सामने ही टूटते गए।
माँ हर राखी पर सुनाती थी किस्सा उस गुणी का,
जो दो रुपये की अनमोल भेंट लेकर चला आया करता था।
उसकी आवाज़ में एक दर्द होता था जो आँखों से बह निकलता था।
खेतों की सूखी ज़मीन से,
वह सब्ज़ियाँ उगाया करता था,
हर साल उन चंद रुपयों से माँ के लिए राखी का तोहफ़ा लाता था।
आज तिजोरियों में पैसे बहुत हैं, पर उस दो रुपये की क़ीमत कहाँ,
जो सुकून मिलता था, वो बेपनाह मोहब्बत कहाँ।
लोग कहते थे, "दीदी, मैं तो हूँ," पर माँ को कोई मंज़ूर नहीं,
वह किनारे बैठ बस रोती रही, अपने भाई के विरह से दूर नहीं।
यह एक साल की बात नहीं, वो बूढ़ी हुईं, पर दर्द जवाँ था।
आज माँ भी नहीं हैं इस ज़मीं पर, पर उनका वो विरह, वो दर्द बाकी है।
आज मुझे भी वही उदासी सताती है, जब भी सामने आती है ये राखी है।
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