स्कूल के किस्से: एक अनसुनी कहानी

सबसे शरारती क्लास और एक अनकही होड़

यह किस्सा तब का है जब स्कूल का हर दिन एक नई शरारत के साथ शुरू होता था। हमारी क्लास की पहचान उसकी बातों और शोर से थी, और हमारी गिनती स्कूल की सबसे बातूनी क्लासेज में होती थी। हमारी क्लास को देखकर ऐसा लगता था मानो एक सर्कस चल रहा हो, जहाँ हर कोई अपनी धुन में मगन था और हर तरफ एक अजीब सी, खुशनुमा अव्यवस्था थी। कोई भी टीचर हमारे क्लास में आती, तो अक्सर कुछ बच्चों को बिना कुछ बोले ही क्लास से बाहर निकाल देती या सबसे पीछे खड़ा कर देती थीं, लेकिन इन सबके बावजूद, हमारी क्लास का शोर पूरे स्कूल के शोर पर हमेशा हावी रहता था।

जब कभी भी टीचर के क्लास में आने में थोड़ी सी देरी हो जाती थी, तो क्लास की मॉनिटर चॉक से ब्लैकबोर्ड पर उनके नाम लिख देती थी। अक्सर टीचर के आने से पहले ही ब्लैकबोर्ड साफ़ कर दिया जाता था, पर कभी-कभी शोर हद से ज़्यादा गुज़र जाता, तो उन शरारती बच्चों का नाम कॉपी पर लिख लिया जाता था और वो नाम टीचर तक पहुँच जरूर जाते थे। फिर क्या होता था, यह अंदाज़ा लगाना मुश्किल नहीं था। डंडे बरसते थे, तशरीफ़ पर, पर गिने नहीं जाते थे।

इस शोर के बीच, हमारी क्लास के टॉपर भी पूरे स्कूल पर हावी थे। हमारे क्लास के दो टॉपर थे, एक दिव्या और दूसरा अमित। दोनों कुछ ही नंबरों से आगे-पीछे रहते थे और उनके बीच एक अनकही होड़ रहती थी। टीचरों के हर सवाल का जवाब इनके पास रहता था। जवाब देने के लिए दोनों एक साथ हाथ उठाते और कभी-कभी तो एक साथ ही जवाब देने लगते थे। कभी-कभी तो पूरी क्लास खड़ी रहती थी और ये दोनों बैठे रहते थे, क्योंकि उन्हें पता था कि वे हर सवाल का जवाब दे सकते हैं।

वो दिन जब सन्नाटा छा गया

एक दिन की बात है, हमारी क्लास टीचर तेज़ी से क्लास में आईं। उनके चेहरे पर गुस्सा साफ झलक रहा था। हमें लगा कि ज़रूर किसी ने कोई शिकायत होगी। मैं आगे से चौथी सीट पर बैठता था। मैंने देखा कि उनके हाथ में एक कागज़ का टुकड़ा और दूसरे हाथ में लकड़ी का स्केल था। अचानक उन्होंने गुस्से से चार बच्चों के नाम पुकारे। चारों मेरी क्लास के सबसे शरारती बच्चे थे। चारों ब्लैकबोर्ड तक पहुँचते, उससे पहले ही उन पर दो-तीन स्केल की रसीद पड़ चुकी थी।

मैम का चेहरा गुस्से से लाल हो रहा था। क्लास में उनके चेहरे को देखकर सन्नाटा छा चुका था, जिसे कहते हैं 'पिन ड्रॉप साइलेंस'। एक पल के लिए तो हवा भी थम गई थी। हर कोई अपनी जगह पर सहमा हुआ बैठा था, और डर की एक ठंडी लहर सबकी रीढ़ की हड्डी में उतर गई थी। कागज़ के टुकड़े को दिखाते हुए मैम ने गुस्से से पूछा, "ये किसने लिखा है?" किसी का कोई जवाब नहीं आया। मैम ने एक बार फिर तेज़ आवाज़ में पूछा, "किसने लिखा है ये?" जवाब फिर भी नहीं आया।

गुस्से में हर बच्चे की तशरीफ़ पर दो-दो स्केल रसीद हो गईं। सबने एक-एक करके 'ना' कहा, किसी का भी कबूलनामा नहीं आया। तभी मैंने देखा कि दिव्या ज़ोर-ज़ोर से रोने लगी। उसके होंठ काँप रहे थे, आँखें सूजी हुई थीं और वह अपने चेहरे को छिपाने की कोशिश कर रही थी, मानो उसे बहुत शर्मिंदगी हो। उसकी सहेलियाँ उसे चुप करा रही थीं, पर वह ख़ामोश होने का नाम ही नहीं ले रही थी। तभी एक और टीचर क्लास में आईं जो अपनी पिटाई के लिए कुख्यात थीं। आते ही उन्होंने सारे बच्चों को सम्बोधित करते हुए कहा, "मुझे बताओ कौन-कौन शामिल है? अगर अभी बता दोगे तो कुछ नहीं कहूँगी, नहीं तो ऐसी मार पड़ेगी कि ज़िंदगी भर याद रखोगे और स्कूल से निकाल दिए जाओगे।" क्लास में सन्नाटा अभी भी छाया था।

एक प्रेम पत्र और मासूमियत का अंत

तभी स्कूल की घंटी बजती है और लंच टाइम हो जाता है। हर तरफ़ से बच्चों का शोर आ रहा था, पर हमारी क्लास अभी भी शांत थी। तभी टीचर ने कहा, "आज किसी को भी लंच करने को नहीं मिलेगा, जब तक वो बच्चा सामने नहीं आता जिसने यह लिखा है।"

हम सब समझ नहीं पा रहे थे कि हो क्या रहा है, किसने क्या लिखा है, पर डर के मारे कोई कुछ बोल नहीं रहा था। भूख के मारे सबके चेहरे उतर गए थे। हमारे मुरझाए हुए चेहरे देख मैम ने हमे जाने दिया खाना खाने के लिए। जाने से पहले हम सबकी हिंदी और इंग्लिश की कॉपियाँ जमा कर ली गई थीं। मन में जिज्ञासा लिए हम सब खुसुर-फुसुर कर रहे थे कि हुआ क्या है। कुछ दोस्तों से पूछा, उन्हें भी नहीं पता था।

फिर हमने दिव्या की दोस्त से पूछा कि दिव्या इतना क्यों रो रही थी। तब उसने विस्तार से बताया कि दिव्या को किसी ने प्रेम पत्र लिखा है और उसे उसके घर में डाल गया है। वह पत्र गुलाबी रंग के ख़ूबसूरत कागज़ पर नीली स्याही से लिखा गया था। उसमें कविताओं और प्रेम के अलंकारों का इस्तेमाल किया गया था। जब दिव्या के घर वालों को इस प्रेम पत्र के बारे में पता लगा तो दिव्या की अच्छे से पिटाई की गई और उसके पापा ने कहा कि तुम इतनी छोटी से उम्र में प्रेम प्रसंग के चक्कर में पड़ गई हो, तुम्हारा भविष्य ख़त्म हो गया है। उसके घर वाले उसका नाम भी स्कूल से कटवा रहे थे और कहा कि अब वो आगे की पढ़ाई नहीं करेगी।

उस पल हमें लगा कि दिव्या सच में एक पीड़ित है, जिसकी मासूमियत पर किसी ने सवाल उठा दिया है। वह अकेली थी और उसका दर्द बहुत गहरा था। इतने बड़े कांड के बाद, कुछ दिन तो बिना पढ़ाई के ही गुज़रे। टीचर्स हमारी क्लास में आती तो थीं पर पढ़ाती नहीं थीं और कहती थीं, "आप लोग खुद ही पढ़ाई कर लो, जब तक पत्र लिखने वाले का नाम सामने नहीं आता, कोई टीचर आप लोगों को नहीं पढ़ाएगी।"

कबूलनामा, बेइज़्ज़ती और एक चौंकाने वाला सच

दिन ऐसे ही बीत रहे थे। मुझे न जाने क्यों ऐसा लग रहा था कि टीचर्स के जासूस कोने-कोने में फैले हुए हैं। अफवाहों का बाज़ार भी बहुत गर्म था। कभी ख़बर आती थी कि प्रेम पत्र इसने लिखा है तो कभी उसने। ख़बर तो यहाँ तक थी कि शायद कुछ लड़कियों ने ही पत्र लिखकर दिव्या के घर डाला है ताकि उसकी पढ़ाई बंद हो जाए। उन दिनों स्कूल की सारी टीचर्स क्लास की लड़कियों को मासूम समझती थीं और लड़कों को घूर कर देखती थीं। उनकी निगाहों में हम गिर चुके थे। कोई भी अच्छे से बात नहीं करता था हमसे। हमने लड़कियों की तरफ़ देखना ही बंद कर दिया था।

एक दिन सारी टीचर्स फिर से हमारी क्लास में आईं। उनके आते ही क्लास में फिर से सन्नाटा छा गया। हमें लगा अब फिर से कुछ होने वाला है। एक टीचर के हाथ में एक मोटा सा डंडा भी था। उन्होंने एक-एक कर 6 बच्चों को बाहर निकाला, जिनमें हमारा टॉपर अमित भी था। सबसे पहले टीचर ने अभिनव को बुलाया और उसकी पीठ पर पड़ रही हर मार के साथ उसका चेहरा दर्द और शर्म से भरा था। कोई गिन नहीं रहा था, बस डंडे बरस रहे थे। अमित अपनी जगह पर शांत बैठा था, पर उसके चेहरे पर एक अजीब सी बेचैनी थी।

चार डंडों में ही अभिनव की ज़ुबान खुल गई और उसने बोला कि ये लेटर उसने आशीष के कहने पर लिखा था। जब आशीष की बारी आई, तो उसने बिना डंडे खाए ही सबकुछ बोलना शुरू कर दिया और पूरी कहानी सामने रख दी। पत्र अभिनव ने लिखा था, दिव्या के घर पत्र डालने गौरव और संतोष गए थे, और रमेश ने सारा प्लान बनाया था। पर जब टीचर्स ने पूछा कि पत्र के शब्द और उसका ख़ूबसूरत लेखन किसका था, तो सबकी नज़रें अमित पर जा टिकीं।

अमित, जो अब तक शांत बैठा था, अचानक सहम गया। उसका रंग उड़ गया और उसने सिर झुका लिया। टीचर्स ने उससे पूछा, "अमित, तुमने लिखा है ये?" अमित की आँखें आँसुओं से भर गईं, पर उसने कुछ नहीं कहा। वह बस रोता रहा। एक टॉपर का इस तरह टूटकर रोना, किसी के लिए भी विश्वास करने लायक नहीं था। आखिर जब टीचर्स ने ज़्यादा ज़ोर लगाया तो उसने कबूल किया कि ये सब उसी का काम था।

उसने बताया कि वह दिव्या से जलन रखता था। वह चाहता था कि दिव्या की पढ़ाई रुक जाए ताकि वह अकेला टॉपर बन जाए। उसने ही पत्र के शब्द लिखे थे और बाकि दोस्तों को अपने प्लान में शामिल किया था। यह सुनकर सब हैरान रह गए। किसी को यकीन नहीं आ रहा था कि अमित जैसा लड़का, जो इतना अच्छा था, ऐसा भी कर सकता है।

इस कबूलनामे के बाद सबकी धुनाई अच्छे से हुई। पर इस बार माहौल बिलकुल अलग था। अमित और उसके दोस्तों को स्कूल से निकालने की प्रक्रिया शुरू की गई। उनके पेरेंट्स को स्कूल में बुलाया गया और सारी बात बताई गई। अमित की इस हरकत ने सबको हिला कर रख दिया। लड़कों को तो बस कुछ दिनों की सज़ा और बेइज़्ज़ती झेलनी पड़ी, पर इस घटना ने दिव्या का जीवन हमेशा के लिए बदल दिया था। उसके घर वालों का उस पर से विश्वास उठ गया था।

लड़के अपनी ज़िंदगी में आगे बढ़ गए। अमित ने 12वीं तक पढ़ाई की और अपनी ज़िंदगी में व्यस्त हो गया। दिव्या भी स्कूल में रही, पर कम उम्र में ही उसकी शादी कर दी गई। वह आगे ठीक से नहीं पढ़ पाई क्योंकि उसके घर वालों को हमेशा यह डर सताता रहा कि कॉलेज जाकर कहीं वह किसी के साथ भाग न जाए। उसकी शादी तो हो गई, पर वहाँ भी उसकी ज़िंदगी आसान नहीं थी। दहेज ने एक श्राप की तरह उसकी ज़िंदगी बर्बाद कर दी। दहेज की लालच में ससुराल वालों ने उसे मार डाला। यह कहानी मैंने जब उसके एक दोस्त की ज़ुबानी सुनी तो मेरा दिल दुख से भर गया और आज भी मैं इस घटना को याद करता हूँ तो सिहर उठता हूँ।

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