लघु कथा: "वह रात"
अस्पताल की चौथी मंज़िल पर एक कमरा था।
अंदर एक महिला लेटी थी – ऑपरेशन सुबह होना था।
शरीर बीमार था, पर मन… वो कहीं और उलझा हुआ था।
शाम होते-होते रिश्तेदार, परिचित, सभी मिलने आए थे।
सबने ढाढ़स बंधाया –
"डरने की कोई बात नहीं… तुम तो बहुत मज़बूत हो।"
थोड़ी देर बाद सब एक-एक कर वापस चले गए –
घर पर बच्चे थे, थकान थी, नींद ज़रूरी थी।
कहकर निकल गए,
जैसे इंसान की ज़रूरत सिर्फ दवाओं तक सीमित हो।
कमरे में अब सिर्फ वह महिला और कमरे की दीवारें थीं।
और एक व्यक्ति।
जो न डॉक्टर था, न रिश्तेदार खास, न कोई ज़िम्मेदार सदस्य।
बस… एक ऐसा इंसान,
जिसके अंदर कुछ अधूरा, कुछ अनकहा, कुछ अंदर से जुड़ा हुआ था।
वह थोड़ी देर चुपचाप खड़ा रहा।
फिर जाकर रिसेप्शन से एक स्टूल लाया, और उस पलंग के पास बैठ गया।
धीरे से उसने महिला की हथेली थामी।
महिला ने आँखें खोलीं, थक कर मुस्कुराई।
"तुम रुके हो?"
उसने बस इतना कहा:
"नींद नहीं आ रही थी… सोचा यहीं बैठ जाऊँ।"
उसकी बात में कोई दावा नहीं था, कोई प्रदर्शन नहीं।
बस एक मौन उपस्थिति थी –
जो दर्द का इलाज नहीं थी,
पर अकेलेपन की दवा ज़रूर थी।
सुबह सूरज निकला।
ऑपरेशन सफल रहा।
दुनिया फिर अपनी गति में लौट गई।
पर उस रात…
एक खाली अस्पताल के कमरे में,
इंसानियत ने एक बार फिर अपनी जगह बना ली थी।
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