हक से तो आ
तू जा, रूठ जा, मैं मनाने वाला नहीं,
तू चाहे जितना सितम कर, मैं झुकने वाला नहीं।
तेरे नखरों की आदत अब दिल पे भारी है,
मेरे सब्र की चादर अब भीगती सारी है।
मैं चुप हूँ, मगर टूटा नहीं हूँ कहीं,
तेरी बेरुख़ी से मिटा नहीं हूँ वहीं।
प्यार से बोल, तो आसमान झुक दूंगा,
समंदर को मुठ्ठी में बंद कर दूंगा।
पर एक बार, बस एक बार —
हक से तो आ, बेझिझक, बेतकल्लुफ़,
जैसे हम पहले मिला करते थे,
तेरे मेरे बीच कोई फ़ासला न रहा करता था।
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