एक किस्सा श्रीमती जी की ज़ुबानी 🎵(लाइट म्यूजिक, मेलोडी और चुटीली बीट्स के साथ)



🎵 एक किस्सा श्रीमती जी की ज़ुबानी 🎵
(लाइट म्यूजिक, मेलोडी और चुटीली बीट्स के साथ)

[अंतरा – 1]
एक शाम थी प्यारी, हवा में थी मिठास,
स्वाति-आदि खा रहे थे बताशे पास।
तभी दुकान में आया एक ज्ञानी,
पनीर की बोली से शुरू हुई कहानी।

[कोरस]
हिसाब लगाओ भाई, दाम बताओ सही,
न कम चलें हम, न ज़्यादा लूट सही।
दुकानदार बोले – “हमरे रेट फिक्स हैं भाई,
प्याले में मटर लो, पर तौल में होई सफाई।”

[अंतरा – 2]
ग्राहक बोला – "100 ग्राम ही लूंगा बस,
क्यों दे रहे 35, ये तो हद है कुछ खास!"
दुकानदार बोला – "छोटा पैक है भैया,
350 का नहीं, यही सिस्टम है भइया!"

[कोरस]
अरे भाई सुनो ज़रा, न करो तुम बहस भारी,
हम ना बेचें चवन्नी-छप्पन, यही है हमारी बारी।
मटर भी चाहिए थोड़ी, सिर्फ 5 की मांग,
दुकानदार बोले – “भैया, नियम हैं हमारे संग!”

[अंतरा – 3]
“50 ग्राम मटर 8 की, 2 ज़्यादा लग गए,
अब हुए 10, ग्राहक जी चौंक गए।”
बोले – "160 किलो बोल कर, 200 तक ले आए,
इतनी मटर से तो सब्जी में पनीर कहीं न पाए!"

[कॉमिक ब्रिज]
बीच में आई दुकानदार की श्रीमती जी,
हँसते हुए बोली – “हम सब्ज़ी नहीं बेचते दीदी!”
“आपका मटर हो या पनीर का हिस्सा,
हम तो तोलते हैं सामान, नहीं सुनते किस्सा!”

[कोरस – मस्ती वाला]
तोलने में थोड़ा ऊपर-नीचे चल जाता है,
सोना नहीं है, ये सब्ज़ी वाला कांटा है!
ग्राहक बोला – “मैडम जी, दे दो 8 की मटर,
वरना मेरी सब्ज़ी हो जाएगी बिल्कुल फीकी बटर!”

[फिनाले]
अंत में तोली गई मटर और पनीर,
श्रीमती जी मुस्काईं – “अब हो जाओ फ्रीर!”
ग्राहक चला मुस्कुराते, लेकर स्वाद भरा थैला,
इस गीत की तरह, सब्ज़ी में आया फिर मज़ा निराला! 🎵


अगर चाहें तो इसे किसी वीडियो रील या छोटे मंचन के लिए कॉमेडी म्यूजिकल एक्ट में भी बदला जा सकता है।
बताएं तो उसकी स्क्रिप्ट और साउंड इफेक्ट्स भी बना दूं!

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