जब सरलता को ढोंग कहा गया

 जब सरलता को ढोंग कहा गया

एक समय था जब मेरी सादगी,
किसी के लिए अपनापन थी,
मेरी ईमानदारी — मित्रता की मिसाल।

फिर अचानक…
एक व्हाट्सएप स्टेटस ने मुझे ठहरा दिया।
"रिश्तों में टिकट क्यों नहीं होते?"
और उसके बाद –
"ढोंग..."
वो शब्द मेरे अंदर किसी कील की तरह धँस गया।

थोड़ी-सी नाराज़गी थी,
थोड़ी दूरी थी,
पर इतनी नहीं कि मेरी पहचान बदल दी जाए।

क्या मैं सच में बदल गया था?
या अब मैं वैसा दिखने लगा
जैसा लोग मुझे देखना नहीं चाहते थे?

अब सोचता हूँ —
शायद मैंने प्रेम और मित्रता का
घोल कुछ ज़्यादा ही शुद्ध परोसा था।
और जब कोई चीज़ बहुत सच्ची होती है,
तो अक्सर… वो पचती नहीं।

मैंने तय कर लिया है —
अब मैं किसी के लिए इतना सुलभ नहीं रहूंगा।
ना इतना स्पष्ट,
ना इतना सरल।

अब थोड़ा रहूँगा खुद में,
थोड़ा उलझा हुआ, थोड़ा अनजान-सा।
क्योंकि जब सरलता को ढोंग कहा जाए,
तो खुद को बचा लेना ज़रूरी हो जाता है।

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