दो पंछी और एक घोंसला
"दो पंछी और एक घोंसला"
थे दो पंछी, एक डाल पर,
चुन-चुन कर तिनका लाए थे,
सपनों से बुना एक घर —
घोंसला कहा जिसे उन्होंने।
हर सुबह सूरज संग जागते,
हर शाम एक-दूजे में सिमटते,
फिर आया जीवन का सबसे सुंदर गीत —
नन्हे पंखों की चहचहाहट।
वो घोंसला भर गया था बच्चों से,
हँसी, मासूमियत और चहक से।
माँ ने पंखों की छाँव दी,
पिता ने हर आंधी से बचा लिया।
सालों बीते…
पंख अब मजबूत हो चले थे,
नज़रें आसमान नापने लगी थीं।
और फिर एक दिन,
नन्हे पंछी उड़ गए —
नई डालें, नए साथी, नए घोंसले खोजने।
डाल वही रही,
घोंसला भी वहीं,
पर अब उसमें सन्नाटा था…
बस दो पंछी, और ढेरों यादें थीं।
वो मुस्कराए —
क्योंकि यही प्रकृति का विधान है।
वे जानते थे,
अब कोई और तिनका जोड़ रहा होगा…
कहीं किसी और डाल पर,
एक नई शुरुआत के लिए।
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें