पंछी और डाल की दोस्ती
"पंछी और डाल की दोस्ती"
थी एक हरी-भरी सी डाल,
चुपचाप खड़ी थी बरसों से,
ना कोई शिकायत, ना कोई सवाल,
बस इंतज़ार था किसी अपने से।
एक दिन उड़ता आया एक पंछी,
आसमान से थका-मांदा सा,
बैठा उस डाल पर धीरे से,
जैसे पहचान हो पुरानी सी।
डाल मुस्काई, कुछ न बोली,
पंछी ने पंख समेट लिए।
धूप, छाँव, बारिशें आईं,
और दोनों एक-दूजे के संग जी लिए।
पंछी गाता, डाल झूमती,
पवन भी रुककर सुनती थी।
साथ बिताए लम्हे वो प्यारे,
जैसे बचपन के दोस्त हमारे।
डाल ने कभी पंछी को रोका नहीं,
जब वो उड़ना चाहे आसमान में।
पंछी ने भी हर बार लौट
वहीं विश्राम लिया, उसी स्थान में।
दोस्ती थी न शब्दों की मोहताज,
न वादों की ज़रूरत थी,
एक विश्वास था, एक अपनापन,
जो हर मौन में भी ज़िंदा थी।
कभी-कभी पंछी दिन-दिन भर नहीं आता,
डाल इंतज़ार में झुक सी जाती है।
फिर जब पंखों की फड़फड़ाहट सुनती,
फिर से मुस्कुराकर लहराती है।
पंछी जानता है —
हर उड़ान के बाद एक ठिकाना है,
और डाल को यकीन है —
हर आकाश में उसका पंछी ही राजा है।
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